Bimal Raturi

"भीड़ में अकेला खड़ा मै ताकता सब को..."

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कुंवारी बिधवा

Posted On: 24 Sep, 2012 Others में

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मिटटी,पत्थर,धूल इन्ही सब के बीच थी उस की ज़िन्दगी,

मजदूर जो थी वो…

दिन भर मेहनत करती,कभी किसी से कुछ ना कहती

न कोई आगे,न कोई पीछे, ना ही कोई दूर का कोई रिश्तेदार

होता भी क्यूँ? पैसा जो ना था उस के पास|

मैं छोटा था जब तब भी ज़िन्दगी उस की वैसे ही थी,

मेरी उम्र बढती गयी तब भी ज़िन्दगी उस की वैसे ही थी|

और आज मेरा बेटा छोटा है,पर उस की ज़िन्दगी में कोई बदलाव नहीं|

न कोई श्रृंगार,न कोई लालिमा,न कोई ख़ुशी,

साल इतने बीते पर साड़ी के रंग तक में भी कोई बदलाव नहीं,

ज़िन्दगी भर मेहनत,सिर्फ दो वक़्त की रोटी के लिए

ना उस के घर कोई आता, ना कहीं जाते ही देखा मैंने उसे आजतक,

न कभी बीमार पड़ती,न कभी उस की दिनचर्या रूकती

सुना था मैंने शादी के तीन रोज में ही पति चल बसा

क्या नाम था उस का आज तक मुझे तो ये भी नहीं पता

नाम की उसे जरुरत ही नहीं पड़ी|

क्या करती नाम का ? 

न किसी को उस से मतलब रहता,न ही उसे किसी से मतलब रहता

मैंने तो ताउम्र उस के संघर्ष को देखा

पर अब उस के काम को मेरा बेटा देखता है

एक दिन यूं ही पूछ लिया उस ने

पापा उस औरत का नाम क्या है???
जवाब मेरे पास नहीं था,

पर पता नहीं कैसे मुहँ से निकल पड़ा

कुंवारी बिधवा     



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11 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

yogi sarswat के द्वारा
September 27, 2012

और आज मेरा बेटा छोटा है,पर उस की ज़िन्दगी में कोई बदलाव नहीं| न कोई श्रृंगार,न कोई लालिमा,न कोई ख़ुशी, साल इतने बीते पर साड़ी के रंग तक में भी कोई बदलाव नहीं, ज़िन्दगी भर मेहनत,सिर्फ दो वक़्त की रोटी के लिए ना उस के घर कोई आता, ना कहीं जाते ही देखा मैंने उसे आजतक, न कभी बीमार पड़ती,न कभी उस की दिनचर्या रूकती सुना था मैंने शादी के तीन रोज में ही पति चल बसा क्या नाम था उस का आज तक मुझे तो ये भी नहीं पता नाम की उसे जरुरत ही नहीं पड़ी| बहुत गहरे शब्द दिए हैं आपने रतूड़ी साब ! मार्मिक और सार्थक से

yogi sarswat के द्वारा
September 27, 2012

और आज मेरा बेटा छोटा है,पर उस की ज़िन्दगी में कोई बदलाव नहीं| न कोई श्रृंगार,न कोई लालिमा,न कोई ख़ुशी, साल इतने बीते पर साड़ी के रंग तक में भी कोई बदलाव नहीं, ज़िन्दगी भर मेहनत,सिर्फ दो वक़्त की रोटी के लिए ना उस के घर कोई आता, ना कहीं जाते ही देखा मैंने उसे आजतक, न कभी बीमार पड़ती,न कभी उस की दिनचर्या रूकती सुना था मैंने शादी के तीन रोज में ही पति चल बसा क्या नाम था उस का आज तक मुझे तो ये भी नहीं पता नाम की उसे जरुरत ही नहीं पड़ी| बहुत गहरे शब्द हैं रतूड़ी साब ! मार्मिक और सार्थक से

drbhupendra के द्वारा
September 26, 2012

बेहद मर्मिम रचना.. बधाई..

    Bimal Raturi के द्वारा
    September 26, 2012

    thanks

Anil Kumar "Pandit Sameer Khan" के द्वारा
September 26, 2012

बिमल जी, आपकी यह रचना सीधे-सादे शब्दों में समाज की एक कड़वी हकीकत को बयान कर रही है आशा करता हूँ इस लेखन के बाद समाज में ऐसी विधवाओं के हित के लिए लोग ज़रूर सोचेंगे…. सराहनीय रचना http://panditsameerkhan.jagranjunction.com/

Anil Kumar "Pandit Sameer Khan" के द्वारा
September 26, 2012

बिमल जी, चुभती हुयी सच्चाई को, साफ़-सुथरे, सीधे-सादे अंदाज़ में आपने हमारे सामने रखा, सच का ये वर्णन शायद कुछ लोगों की सोंच में बदलाव लाये और वे अपने घर और समाज की विधवाओं के जीवन को सुधारने में कोई सकारात्मक कदम उठायें इसी आशा के साथ आपको सादर प्रणाम…. http://panditsameerkhan.jagranjunction.com/2012/09/19/girlsvsboys/

manoranjanthakur के द्वारा
September 24, 2012

बहुत बधाई

    Bimal Raturi के द्वारा
    September 24, 2012

    thanks sir aashirwaad bnaye rakhen…..

manoranjanthakur के द्वारा
September 24, 2012

बघिया बहुत खूब भाव लिए अति सुंदर

    Bimal Raturi के द्वारा
    September 24, 2012

    thanks bhai ….


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