Bimal Raturi

"भीड़ में अकेला खड़ा मै ताकता सब को..."

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मेरे सवाल और काफ़िर

Posted On: 21 Feb, 2017 में

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लिख तो 6 बजे रहा हूँ पर अपडेट रात 9 बजे के करीब करने की कोशिश करूँगा , ये दिल की बातें भी बाज़ार के दायरे में आ गयी हैं| सोशल मिडिया में लिखते लिखते इतने दिनों में जो जान पाया हूँ उस में ये भी है कि रात 9 बजे के करीब लाइक खूब आते हैं , मेरी लिखी बातों को, मेरी लिखी लाइनों को पता नहीं कितने पढ़ते होंगे पर उस वक़्त थोक के भाव लाइक आते हैं जिससे मैं एक खुसफहमी में जी लेता हूँ कि मैं अच्छा लिख लेता हूँ |

इन पहाड़ों के बीच मैं बाहर हो रही बारिश को पता नहीं कितना महसूस कर रहा हूँ पर उस की बदौलत बढ़ चुकी ठण्ड से बचने के लिए हीटर के सामने जरुर बैठा हूँ उस की तेज चमकती 2 हीटिंग रॉड मेरी आँखों को चौंधिया जरुर रही हैं पर मेरे अन्दर के सवालों की गर्मीं उसे जरुर बैलेंस करने की कोशिश कर रही है |

सवाल क्यूँ जरुरी हैं? सवाल कब पूछने चाहिए ? सवाल किससे पूछने चाहिए ? सवाल पूछने भी चाहिए या नहीं ? सवाल पूछने का सही वक़्त क्या हो? सवाल में सिर्फ सवाल हो या भड़ास भी हो ? किससे सवाल कभी नहीं पूछने चाहिए ? सवाल पूछने की सही उम्र क्या है ?

ऊपर के सवाल मैं बार बार खुद से और कईयों से पूछता रहता हूँ क्यूंकि मुझे लगता है कि सवाल इस बात का सुबूत है कि हम जिंदा हैं , हम सोच रहे हैं , हमारे दिल की धड़कने चल रही हैं | मैंने कभी सवाल कभी किसी को नीचा दिखाने के लिए नहीं किये …बहुत बार लगा कि सामने वाला अनकम्फ़र्टेबल है तो अपने सवालों को रोक भी दिया | मैंने छोटे से छोटे और बड़े से बड़े से सवाल किये और उन लोगों को रोका जो किसी और को सवाल करने से रोकते हैं |

मुझे याद नहीं पर कहा था किसी ने कि किसी भी शख्सियत को फॉलो करो पर उसे भगवान् मत बना दो क्यूंकि हम भगवान् से सिर्फ मांग सकते हैं उस से सवाल नहीं कर सकते | शायद #भक्त शब्द वहीँ से पैदा हुआ हो जो सिर्फ सुनता है कभी सवाल नहीं करता कभी कुछ पूछता नहीं है |

कुछ दिनों पहले एक लाइन सोशल मिडिया में ही वायरल हुई थी

“हम भक्त हैं तो तुम क्या हो काफ़िर ?”

अगर तुम्हारे सवाल तुम्हें काफ़िर बनाते हैं तो एक बार खुद से पूछो कि क्या सच में तुम सवाल पूछना चाहते हो या इस तीर से निशाना कोई और लगा रहे हो ? अगर सच में सवाल हैं तो डरो मत काफ़िर बनने से क्यूंकि बुरा सबसे बुरा है सवालों का मार जाना सोच का मार जाना |

एक कविता याद आ रही है पाकिस्तान के एक मशहूर शायर सुलेमान हैदर की ‘मैं भी काफ़िर, तू भी काफ़िर” पढ़ लीजियेगा शायद पसंद आये

मैं भी काफ़िर, तू भी क़ाफ़िर
फूलों की खुशबू भी काफ़िर
शब्दों का जादू भी काफ़िर
यह भी काफिर, वह भी काफिर
फ़ैज़ भी और मंटो भी काफ़िर

नूरजहां का गाना काफिर
मैकडोनैल्ड का खाना काफिर
बर्गर काफिर, कोक भी काफ़िर
हंसी गुनाह, जोक भी काफ़िर

तबला काफ़िर, ढोल भी काफ़िर
प्यार भरे दो बोल भी काफ़िर
सुर भी काफिर, ताल भी काफ़िर
भांगरा, नाच, धमाल भी काफ़िर
दादरा, ठुमरी, भैरवी काफ़िर
काफी और खयाल भी काफ़िर

वारिस शाह की हीर भी काफ़िर
चाहत की जंजीर भी काफ़िर
जिंदा-मुर्दा पीर भी काफ़िर
भेंट नियाज़ की खीर भी काफ़िर
बेटे का बस्ता भी काफ़िर
बेटी की गुड़िया भी काफ़िर

हंसना-रोना कुफ़्र का सौदा
गम काफ़िर, खुशियां भी काफ़िर
जींस भी और गिटार भी काफ़िर
टखनों से नीचे बांधो तो
अपनी यह सलवार भी काफ़िर
कला और कलाकार भी काफ़िर
जो मेरी धमकी न छापे
वह सारे अखबार भी काफ़िर

यूनिवर्सिटी के अंदर काफ़िर
डार्विन भाई का बंदर काफ़िर
फ्रायड पढ़ाने वाले काफ़िर
मार्क्स के सबसे मतवाले काफ़िर
मेले-ठेले कुफ़्र का धंधा
गाने-बाजे सारे फंदा

मंदिर में तो बुत होता है
मस्जिद का भी हाल बुरा है
कुछ मस्जिद के बाहर काफ़िर
कुछ मस्जिद में अंदर काफ़िर
मुस्लिम देश में अक्सर काफ़िर

काफ़िर काफ़िर मैं भी काफ़िर
काफ़िर काफ़िर तू भी काफ़िर

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